उत्तराखंड

Phool Dei: फूलदेई त्योहार से जुड़ी भगवान शिव और माता पारवती की मान्यता

Phool Dei: पर्वतीय राज्य देवभूमि उत्तराखंड में बसंत ऋतु के आगमन के साथ पारंपरिक लोक पर्व फूलदेई उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। फूलदेई त्यौहार चैत्र मास के पहले दिन मनाया जाता है। इस दिन के शुभ अवसर पर छोटे बच्चे घर-घर जाकर देहलियों पर फूल डालते हैं और घर की खुशहाली के लिए प्रार्थना करते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। कुमाऊं मंडल में इस पर्व को फूलदेई और गढ़वाल में फूल क्रांति के नाम से जाना जाता है।

बसंत ऋतु के आगमन का त्यौहार (Phool Dei)

उत्तराखंड की सांस्कृतिक परंपराओं में फूलदेई एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह हर साल चैत्र मास के पहले दिन मनाया जाता है। जैसे ही बसंत ऋतु का आगमन होता है पहाड़ों और गांव में इस पर्व की रौनक देखने को मिलती है। खासतौर पर छोटे बच्चों में त्यौहार को लेकर अलग तरह का उत्साह रहता है।

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मुख्य रूप से बच्चों का त्यौहार

फूलदेई मुख्य रूप से बच्चों (uttarakhand festivals) का त्यौहार है। छोटे-छोटे बच्चे सुबह होते ही टोकरियों में रंग-बिरंगे फूल इकट्ठा करते हैं। यह फूल आसपास के बगीचों और जंगलों से तोड़कर लाते हैं। इसके बाद बच्चे गांव या मोहल्ले के हर घर की देहलियों पर जाकर फुल रखते हैं और घर की सुख शांति की कामना करते हैं। इस दौरान सभी बच्चे फूल देई, छम्मा देई, देणी द्वार, भर भकार, ये देली स बारम्बार नमस्कार! गाते हुए हर किसी के घर जाते हैं।

पंक्ति का क्या है अर्थ? (Phool Dei 2026)

इस पंक्ति का मतलब है कि घर की दहली फूलों से सजी रहे। परिवार में सुख शांति बनी रहे और घर में अनाज का भंडार भरा रहे। यही कामना बच्चे हर किसी के घर की देहली पर जाकर करते हैं। घर के लोग बच्चों को स्नेह देते हैं और आशीर्वाद देते हुए गुड, मिठाई, चावल, अनाज और कुछ पैसे भी भेंट करते हैं। इससे पूरे माहौल में खुशी भर जाती है। बच्चों को जब फल मिठाइयां और पैसे मिलते हैं तो उनकी खुशी भी साथ में आसमान पर पहुंच जाती है।

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त्योहार से जुड़ी पौराणिक मान्यता

इस त्योहार से एक पौराणिक मान्यता (Phool Dei Uttarakhand) भी जुड़ी है। जिसके अनुसार भगवान शिव लंबे समय तक तपस्या में लीन थे। उन्हें जगाने के लिए माता पार्वती ने शिवगणों को बच्चों का रूप धारण कर पीले वस्त्र पहनने को कहा था। इसके बाद बच्चे बने शिवगणों ने जगह-जगह से फूल इकट्ठे किए और भगवान शिव को अर्पित किए। फूलों की खुशबू से आसपास पूरा इलाका महक गया और भगवान शिव की त्यस्या भंग हो गई। तभी से इस परंपरा को फूल अर्पित करने के प्रतीक के रूप में फूलदेई पर्व के रूप में मनाया जाने लगा है।

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