Uttarakhand: CM विवेकाधीन राहत कोष में चल रहा करोड़ों का खेल
Uttarakhand: उत्तराखंड में मुख्यमंत्री विवेकाधीन राहत कोष को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। किसान मंच द्वारा डाली गई आरटीआई के जरिए सामने आए आंकड़ों के आधार पर आरोप लगाया गया है कि राहत कोष का वितरण निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से नहीं हुआ है। संगठन का कहना है कि यह कोष विवेकाधीन की जगह संपर्काधीन व्यवस्था बनता जा रहा है।

आरटीआई में मिली जानकारी (Uttarakhand)
आरटीआई में मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 2023-24 और 2024-25 के दौरान कुल 6,65,37,000 की राशि केवल दो जिलों चंपावत और उधम सिंह नगर में वितरित की गई है। यह दोनों जिले ही मुख्यमंत्री धामी के करीब ही जिले हैं। इसमें चंपावत में 1,359 लाभार्थियों को 2,65,05,000 और उधम सिंह नगर में 2,142 लाभार्थियों को 4,00,32,000 दिए गए हैं। कुल 3,501 लाभार्थियों के लिए आंकड़े कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
सीमित क्षेत्र में केंद्रित राशि
किसान मंच ने आरोप लगाया है कि इतनी बड़ी राशि का सीमित क्षेत्र में केंद्रित होना केवल सहयोग की बात नहीं है। संगठन का कहना है कि इन जिलों का संबंध मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कर्मभूमि और जन्मभूमि से होने के कारण। वितरण प्रक्रिया पर पक्षपात के आरोप लग रहे हैं।
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आंकड़ों में स्पष्ट पैटर्न (Uttarakhand News)
संगठन ने दावा किया है कि आंकड़ों में एक स्पष्ट पैटर्न नजर आ रहा है। जिसमें कई लोगों को एक से ज्यादा बार सहायता राशि दी गई है। कुछ मामलों में एक ही व्यक्ति को दो से तीन बार तक 50000 से 2 लाख तक की मदद मिलने की बात कही गई है। वहीं कई परिवारों के अलग-अलग सदस्यों को बार-बार लाभान्वित किया गया है।
जरूरतमंदों को कम राशि
किसान मंच ने आरोप लगाया है कि वास्तविक जरूरतमंदों को केवल 3,000 से 5,000 तक की छोटी राशि देकर औपचारिकता पूरी की गई है। संगठन ने इसे गरीबों के साथ मजाक और संवेदनहीन व्यवस्था करार दिया है।
प्रेस वार्ता के दौरान मंच ने कुछ नाम का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रभावशाली और राजनीतिक रूप से जुड़े लोगों को बड़ी राशि दी गई है। जिसमें पूर्व राज्य मंत्री, बोर्ड सदस्य और विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम शामिल बताए गए हैं। इसके अलावा कुछ अज्ञात लाभार्थियों को भी लाखों रुपए की सहायता मिलने का दावा किया गया है। जिस प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
सार्वजनिक जानकारी साझा करने से परहेज (Uttarakhand CM)
आरटीआई के तहत जब आवेदन पत्र, अस्पताल बिल और अन्य संबंधित दस्तावेज मांगे गए तो उन्हें निजी जानकारी बता कर देने से इनकार किया गया है। किसान मंच का कहना है कि जब सार्वजनिक धन का उपयोग हो रहा है तो उससे जुड़ी जानकारी को सार्वजनिक करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। इस तरह से जानकारी छुपाने से संदेह और ज्यादा बढ़ता है।
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मामला गंभीर और ज्यादा इसलिए है क्योंकि एक ही परिवार के कई सदस्य को बार-बार सहायता दी गई है। जिससे यह संकेत मिल रहा है कि लाभ सीमित दायरे में ही घूम रहा है। इससे वास्तविक जरूरतमंद लोग पीछे छूट सकते हैं।
श्वेत पत्र जारी करने की मांग
इस पूरे मुद्दे पर किसान मंच ने श्वेत पत्र जारी करने और स्वतंत्र जांच की मांग की है। संगठन का कहना है कि अगर सरकार अपने कामकाज में पारदर्शी है तो आंकड़े और दस्तावेज भी सार्वजनिक करने चाहिए। अगर इस मामले में निष्पक्षता से जांच नहीं हुई तो प्रदेश व्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा। साथ ही है मामला उच्च स्तर तक केंद्र सरकार और न्यायपालिका तक ले जाने के बाद भी कही गई है।
राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा का विषय
यह पूरा विवाद राजनीतिक और प्रशासनिक स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है। सवाल है कि क्या मुख्यमंत्री विवेकाधीन राहत कोष वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है या फिर यह व्यवस्था किसी सीमित दायरे तक ही सीमित रह गई है।

