उत्तराखंडहरिद्वार

Haridwar में आयोजित हुआ संस्कृत सम्मेलन, 16 राज्यों के विद्वान शामिल

Haridwar: उत्तराखंड संस्कृत अकादमी द्वारा भारतीय संस्कृत ज्ञान परम्परा की उपाधीयता विषय में अखिल भारतीय संस्कृत शोध सम्मलेन का आयोजन किया गया। जिसमें सोलह राज्यों के विद्वान और स्कूल के छात्रों ने प्रतिभाग किया। देवभूमि उत्तराखंड(Haridwar) में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया गया है। इससे यह तातपर्य होता है कि ऐसे में हमारे ऊपर यह जिम्मेदारी बढ़ती है कि हम इस ओर ज्यादा ध्यान दे। जिसके चलते शाशन स्तर पर संस्कृत के प्रचार प्रसार हेतु संरक्षण और संवर्धन के लिए संस्कृत विभाग के निर्देशन में उत्तराखंड संस्कृत अकादमी द्वारा प्रदेश के सम्मस्त शाश्कीय कार्यालयों और शिक्षण संस्थानों में संस्कृत प्रतियोगिताएं, संघोष्टियाँ, सम्मेलन, चर्चा एवं संवाद का आयोजन किया जा रहा है। 

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हमारे शास्त्रों में विज्ञान को समझाया गया 

उत्तराखंड काउंसिल ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के माध्यम से प्रथम बार संस्कृत से विज्ञान पर चिंतन भी हुआ है। देशभर से आए विद्वानों ने इस बात पर चर्चा करी कि किस तरह से हमारे शास्त्रों में विज्ञान को समझाया गया है। परन्तु हम इसको आधुनिक विज्ञान से सिद्ध करते है। जबकि हमारे ऋषि मुनियों ने सदियों पहले ही  यह सब बता दिया है। 

संस्कृत पढ़कर लोगों में आते है संस्कार 

संस्कृत पढ़ने से संस्कारो और आचरण में सुधर आता है। इसके साथ ही हमारी याददाश्त भी अच्छी हो जाती है। यह एक रिसर्च पर आधारित है जो गुडगाँव में हुई थी। जिसमें छात्रों के दो समूहों पर शोध किया गया था। इस शोध में यह पाया गया की जो बच्चें सात साल से संस्कृत पढ़ रहे उनकी स्मृति अन्य समूह के बच्चों से ज्यादा  थी। 

संस्कृत भाषा केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारे इतिहास की जीवंत धड़कन है। यह भाषा भारत की सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक मानी जाती है, और हमारे साहित्य, संस्कृति और दर्शन की गहराइयों से जुड़ी हुई है।

जब कोई संस्कृत का अध्ययन करता है, तो वो सिर्फ शब्दों और व्याकरण तक सीमित नहीं रहता — वह हमारे वेदों, उपनिषदों, महाकाव्यों और दार्शनिक परंपराओं से सीधा जुड़ जाता है। संस्कृत हमें अपने heritage से जोड़ती है, और भारतीय ज्ञान की परंपरा को समझने का एक गहरा माध्यम बनती है।

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