Haridwar: अर्ध कुंभ को कुंभ बताना तीर्थ परंपरा का अपमान- आचार्य सुरेश अवस्थी
Haridwar: जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी प्रबोधानंद गिरी और महामंडलेश्वर स्वामी यतींद्रानंद गिरी को अखाड़े से निष्कासित कर दिया गया है। दोनों संतों ने हरिद्वार के भारत सेवा आश्रम में साधु-संतों की बैठक में भाग लिया था।
अर्ध कुंभ को कुंभ की तर्ज पर आयोजित करना गलत (Haridwar Kumbh 2027)
अर्ध कुंभ को कुंभ की तर्ज पर आयोजित करना सही या गलत इसपर आचार्य सुरेश प्रसाद अवस्थी ने विस्तार से जानकारी साझा की है-
महाकुंभ गुरु के राशि परिवर्तन के आधार पर पर लगता है- जो कि गुरु एक वर्ष में एक राशि पार करते हैं। 12 वर्ष में वह पुनः लौटकर अपनी इस राशि पर आते हैं और चार जगह कुंभ लगता है क्योंकि चार वेद हैं, चार युग हैं, चार वर्ण हैं और चार आश्रम हैं। जिस प्रकार वेद का आधा उपवेद है, इस प्रकार महाकुंभ का आधा अर्ध कुंभ है और कोई भी कार्य हम 12 वर्ष तक करते हैं तो उसकी हमारी सिद्धि होती है। जिस प्रकार माता-पिता की आज्ञा से भगवान सीता-राम 14 वर्ष का वनवास काटा 12 वर्ष पंचवटी पर रहे। माता और पिता कारक ग्रह सूर्य और चंद्रमा है। इसीलिए संन्यास के बाद भी माता का महत्व अधिक होता है क्योंकि तीन आश्रम तक पिता सूर्य की 12 कलाएं हैं और चंद्रमा की 16 कलाएं हैं। इसलिए संतों की षोडशी भी होती है क्योंकि चतुर्थ आश्रम में चतुर्थ संध्या जो की रात में पड़ती है। जल तत्व से संबंध रखती है। जिसे “तुरीय संध्या” भी कहते हैं। उसका संबंध चंद्रमा से है, जल तत्वों से है और चतुर्थ आश्रम का संबंध जल तत्व से है। इसीलिए वैष्णव को जल समाधि दी जाती है।
जिस प्रकार भगवान श्री राम सरयू में अपना शरीर छोड़कर वापस बैकुंठ लौट गए थे। कोई भी साधना या सिद्धि 12 वर्ष में पूर्ण होती है। इसलिए 12 वर्ष में ही कुंभ लगता है। तो अभी महाकुंभ कैसे लग सकता है? मूर्ख उन्हें बनाया जाता है जो आम जनता है। जो विद्वान है वह जानते हैं कि कौन सही है और कौन गलत, कौन राजनीतिक खेल रहा है और कौन उसका शिकार हो रहा है। किंतु याद रहे इस पृथ्वी पर हर जीव भगवान के ही अंश है। कोई कुत्ता बनकर अपने कर्म काटता है, कोई ब्रह्मराक्षस और प्रेत बनकर।
वैसे तो सभी ज्ञानी है- पशु-पक्षी और मिर्ग भी। किंतु मनुष्यों को संजय रूपी बुद्धि प्राप्त है। ज्ञान रूपी दिव्या दृष्टि प्राप्त है। जिससे वह देख सकता है। किंतु युद्ध रोक नहीं सकता क्योंकि किसी के काम पर उसका अधिकार नहीं है। दैविक और शास्त्रीय विधान के साथ छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए। जब उनका ज्ञान ना हो।
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क्या है पूरा मामला?
दरअसल, जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी प्रबोधानंद गिरि और महामंडलेश्वर स्वामी यतींद्रानंद गिरी हरिद्वार के भारत सेवा आश्रम में साधु-संतों की बैठक में शामिल हुए थे। इस बैठक में आगामी कुंभ मेले को लेकर चर्चा होनी थी। लेकिन, देर शाम को इस बैठक में जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी प्रबोधानंद गिरी और महामंडलेश्वर स्वामी यतींद्रानंद गिरी को अखाड़े से निष्कासित कर दिया गया।
अर्ध कुंभ को लेकर दिया था बयान (Haridwar Kumbh 2027 News)
प्राप्त जानकारी के अनुसार, साल 2027 में होने वाले अर्ध कुंभ से पहले साधु संत आपस में ही दो हिस्सों में बंट गए हैं। इससे पहले स्वामी रूपेंद्र प्रकाश और स्वामी प्रबोधानंद गिरि ने अखाड़ा परिषद के अस्तित्व पर सवाल उठा दिए थे। उन्होंने अर्ध कुंभ को पूर्ण कुंभ की तर्ज पर आयोजित करने को परंपराओं के साथ खिलवाड़ करना बताया था।
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मोहन भारती महाराज ने दिए बयान
अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष मोहन भारती महाराज ने बयान दिया की दोनों संतों ने एक बैठक में सरकार और प्रशासन के खिलाफ गलत बयान दिए थे। यह आगामी कुंभ मेला बिगाड़ना चाहते हैं। जिससे सनातन धर्म की छवि खराब हो रही है। मोहन भारती महाराज ने बताया कि स्वामी प्रबोधानंद गिरी के खिलाफ पहले से ही शिकायतें आ रही थी।

