Uttarakhand: राज्य आंदोलन के योद्धा! शेर कामरेड राजा बहुगुणा का हुआ निधन
Uttarakhand: उत्तराखंड में भाकपा पार्टी के संस्थापक नेताओं में से एक कामरेड राजा बहुगुणा का दिल्ली में निधन हो गया है। वह भारत की कम्युनिस्ट पार्टी लिबरेशन के केंद्रीय कंट्रोल कमीशन के अध्यक्ष भी थे। वर्ष 2023 से वह लिवर कैंसर से जूझ रहे थे। पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि पार्टी अपना लाल झंडा उस प्रिय कामरेड के सम्मान में झुकेगा जिन्होंने अपना पूरा जीवन मेहनत से जिया और जनता के लिए संघर्ष किया।
राजनीति में अच्छी पकड़ (Uttarakhand)
कामरेड राजा बहुगुणा की राजनीति में अच्छी पकड़ थी। वह जनता के अधिकारों और समतामूलक समाज (ऐसा समाज है जहाँ सभी लोगों को निष्पक्षता और न्याय के आधार पर समान अवसर, संसाधन और अधिकार प्राप्त होते हैं) के लिए अपना जीवन समर्पित कर चुके थे। उनका राजनीतिक जीवन उनके कॉलेज काल के शुरुआती दिनों में नैनीताल से ही शुरू हो गया था। शुरू में उन्होंने युवा कांग्रेस के साथ काम किया। लेकिन, जल्द ही शासन वर्गीय राजनीति से उनका मन हट गया और 70 के दशक में उन्होंने अपने आप को आपातकाल विरोधी आंदोलन और वन आंदोलन से जोड़ लिया।
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राज्य के लिए किया संघर्ष
वह 70 के दशक में उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी में शामिल हुए। उन्होंने पर्यावरण पर हमले, किसानों और मजदूरों के अधिकार और रोजगार के कई आंदोलन का नेतृत्व किया। उनका संघर्ष नैनीताल, अल्मोड़ा जिले समेत अन्य हिस्सों में भी देखने को मिला।
भाकपा (माले) का गठन (Raja Bahuguna uttarakhand)
80 के दशक के शुरुआती साल में राजा बहुगुणा भाकपा (माले) के संपर्क में आ गए। उन्होंने अपने कुछ अन्य साथियों के साथ मिलकर उत्तराखंड में भाकपा (माले) का गठन भी किया। उस दौरान उत्तराखंड अविभाजित उत्तर प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था। उत्तराखंड राज्य निर्माण के आंदोलन में कामरेड राजा बहुगुणा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने उत्तराखंड राज्य के भविष्य की दशा और दिशा को लेकर एक पुस्तिका भी लिखी थी।
उत्तराखंड पीपल्स फ्रंट का गठन
कुछ वर्षों बाद उन्होंने उत्तराखंड पीपल्स फ्रंट का भी गठन किया था। जिससे अलग राज्य की लोकतांत्रिक भावनाओं को भी आवाज दी जा सके। वह इंडियन पीपल्स फ्रंट के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष थे। बिंदुखत्ता में भूमिहीनों को भूमि वितरण के ऐतिहासिक आंदोलन और तराई के क्षेत्र में महिला हिंसा और उत्पीड़न के खिलाफ मेहतोष मोड़ जैसे बड़े आंदोलन का भी उन्होंने नेतृत्व किया था।
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जनता के लिए जेल तक पहुंचे (Uttarakhand News)
उन्होंने अलग राज्य के संघर्ष और जनता के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया। इस दौरान पुलिस दमन, लाठी और जेल का भी उन्होंने बहादुरी से सामना किया था। वर्ष 1989 में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा और अच्छे वोट हासिल किए थे। 90 के दशक तक उनकी अगुवाई में पार्टी लगभग उत्तराखंड के हर हिस्से में फैल गई थी।

