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Uttarakhand: हाईकोर्ट सख्त, प्रशासन अलर्ट! फिर भी नहीं रुक रहा अवैध खनन?

Uttarakhand: उत्तराखंड में अवैध खनन एक गंभीर पर्यावरणीय और प्रशासनिक चुनौती बन गया है। राज्य की गंगा, यमुना और अन्य नदियों के किनारो पर लगातार अवैध तरीके से रेत, बजरी और पत्थरों का खनन किया जा रहा है। हाईकोर्ट, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और कई सरकारी एजेंसियों की सख्ती के बाद भी यह धंधा पूरी तरह से नहीं रुक पाया है।

अदालत ने राज्य सरकार से मांगा जवाब (Uttarakhand News)

हाल ही के वर्षों में कई मामलों में अदालत में राज्य सरकार से भी जवाब मांगा है। इसके अलावा प्रशासनिक कार्रवाई पर भी सवाल उठाए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अनियंत्रित खनन के कारण पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है। साथ ही बाढ़, भू-कटाव और जमीन धंसने जैसी घटनाओं का खतरा भी बढ़ रहा है।

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हाईकोर्ट और एनजीटी की सख्ती

उत्तराखंड हाईकोर्ट में जून 2025 में उधमसिंह नगर की फीका नदी में हो रहे अवैध खनन पर राज्य सरकार से भी रिपोर्ट तलब की गई थी। अदालत में दाखिल जनहित याचिका में आरोप लगाया गया था कि प्रशासनिक कार्रवाई के बावजूद भी नदी में अवैध खनन जारी है। सरकार ने कोर्ट को बताया कि अवैध खनन करने वालों पर लगभग 16 लाख का जुर्माना लगाया गया है।

बड़े पैमाने पर मशीन खनन जारी (Uttarakhand News)

सितंबर 2025 में हाईकोर्ट में राज्य सरकार को नदियों में मशीनों से हो रहे खनन को रोकने के लिए विस्तृत एक्शन प्लान करने का निर्देश दिया। अदालत ने साफ कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने केवल मैनुअल मीनिंग की अनुमति दी है। लेकिन, राज्य में बड़े पैमाने पर मशीनों से खनन हो रहा है। एनजीटी में भी उत्तराखंड के कई मामलों की सुनवाई चल रही है। एक मामले में ट्रिब्यूनल के सामने पेज रिपोर्ट में बताया गया कि विकास नगर क्षेत्र में अवैध खनन और परिवहन के 338 मामलों में एक करोड रुपए से भी अधिक की वसूली की गई।

सरकारी आंकड़े क्या कहते हैं?

उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य सरकारी रिपोर्ट के अनुसार फरवरी 2025 तक राज्य में अवैध खनन, अवैध परिवहन और अवैध भंडारण के लगभग ढाई सौ मामलों में कार्रवाई की गई। इसके अलावा करीब 3.5 करोड़ रुपए की रिकवरी भी हुई है। कई जिलों में ट्रैक्टर ट्राली और स्टोन क्रेशर सीज करने की जानकारी दी गई है।

पर्यावरण पर गंभीर असर (Uttarakhand Illegal Mining)

विशेषज्ञ के अनुसार नदी तल से अत्यधिक रेत और पत्थर निकालने से नदियों का प्राकृतिक प्रभाव प्रभावित होता है। इससे जलस्तर कम होता है, जैव विविधता पर असर पड़ता है और बरसात के समय बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाता है। हाल ही में बागेश्वर को लेकर एक विशेषज्ञ समिति ने चेतावनी दी कि अनियंत्रित खनन और निर्माण गतिविधियों की वजह से वहां जोशीमठ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। इस रिपोर्ट में जमीन धसने के शुरुआती संकेत मिलने की बात कही गई।

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हरिद्वार क्षेत्र में लंबे समय से विवाद

हरिद्वार गंगा नदी क्षेत्र में अवैध खनन का मुद्दा लंबे समय से चल रहा है। कई वर्षों से सामाजिक कार्यकर्ता और मातृ सदन जैसी संस्था इस पर आवाज उठा रही है। रिपोर्ट में बताया गया है की गंगा नदी के किनारे अवैध स्टोन क्रशिंग और खनन के खिलाफ आंदोलन करने वाले स्वामी निगमानंद की 2011 में मौत के बाद यह मुद्रा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था। हाल ही में हाईकोर्ट में आरोप लगाए गए कि हरिद्वार और रायवाला क्षेत्र में नियमों के विरुद्ध खनन स्टोन क्रशर संचालन जारी है।

क्यों नहीं रुक रहा अवैध खनन?

विशेषज्ञों का मानना है कि अवैध खनन के पीछे स्थानीय स्तर पर मजबूत नेटवर्क काम करते हैं। कई बार प्रशासनिक लापरवाही, सीमित निगरानी और राजनीतिक दबाव की वजह से करवाई प्रभावी ढंग से नहीं हो पाती है। हालांकि, सरकार लगातार छापेमारी और वाहनों की सीजन जैसी कार्रवाई कर रही है। पर सवाल उठता है कितनी निगरानी के बाद भी नदियों में मशीन उतर कैसे रही है।

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